(फोटो आभार मनीष गुप्ता)
“What is that you express in your eyes? It seems to memore than all the print I have read in my life.”
Walt Whitman
समकालीनमहत्वपूर्ण कवियों पर आधारित स्तम्भ ‘मैं और मेरी कविताएँ’ के अंतर्गत आपने ‘आशुतोषदुबे’ और ‘अनिरुद्ध उमट’ की कविताएँ और वे कविता क्यों लिखते हैं पढ़ा. आज रुस्तमसिंह की कविताएँ और वक्तव्य प्रस्तुत है.
सच्चा-खराकवि किस तरह से अपने आप से पूछता है और तलाशता है कि आख़िर वह कविता क्यों लिखताहै, यह सब इस उत्तर में आपको दिखेगा. कविता की तरफ जाने का यह भी एक रास्ता है.
कवि और दार्शनिक,रुस्तम (30 अक्तूबर 1955) के पाँच कविता संग्रह और अंग्रेज़ी में उनकी तीनपुस्तकें प्रकाशित हैं. उनकी कविताएँ अंग्रेज़ी,तेलुगु,मराठी,मल्याली,पंजाबी,स्वीडी,नौर्वीजी तथा एस्टोनी भाषाओं में भी अनूदित हुई हैं. उन्होंने नार्वे के कवियों उलाव हाउगे व लार्शअमुन्द वोगे की चुनी हुई कविताओं का अनुवाद हिन्दी में भी किया है.
मैंऔर मेरी कविताएँ(३) : रुस्तम
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बस लिखना चाहता हूँ.
मैं कविता क्यों लिखता हूँ.
इस प्रश्न में कम से कम दो धारणाएँ अंतर्निहित हैं. पहली यहकि हर कवि को पता होता है कि वह कविता क्यों लिखता है या लिखती है. और दूसरी यह किहर कवि का कविता लिखने के पीछे कोई उद्देश्य होता है. यह दूसरी धारणा बहुत स्पष्टरूप में इस प्रश्न में नज़र नहीं आती,पर ध्यान से देखें तो हम पाते हैं कि वह वहाँ है. परन्तु ज़रूरी नहीं कि हर कविको पता हो कि वह कविता क्यों लिखता है.
चौदह वर्ष की उम्र में जब मैंने अपनी पहली ऐसी दो कविताएँलिखीं जिन्हें मेरी अपनी कविताएँ कहा जा सकता था,तो मैं न तो यह जानता था कि मैं कविताएँ क्यों लिख रहा थाऔर न ही यह कि उन्हें लिखने के पीछे मेरा क्या उद्देश्य था. मैं बस कविताएँ लिखनाचाहता था. उसी तरह जैसे उन दिनों और उससे पहले भी मैं अन्य कवियों की कविताएँ पढ़नाचाहता था. हालाँकि मेरे पढ़ने के लिए कविताएँ आसानी से उपलब्ध थीं,ऐसा बिल्कुल नहीं था.
जब मैं नौ बरस का हुआ तब तक हम गाँव में रहते थे. और हमपढ़ने के लिए एक दूसरे,बड़े गाँव केसरकारी प्राइमरी स्कूल में जाते थे जहाँ चार-पाँच गाँवों से बच्चे आते थे. यह गाँवपंजाब में था. मेरी माँ अनपढ़ थीं और मेरे पिता पाकिस्तान की सरहद पर तैनात थे.इन्हीं दिनों मेरे पिता ने नौकरी छोड़ दी और हम हरियाणा के एक कस्बे या छोटे शहरमें आ बसे. हमारे घर में एक भी साहित्यक किताब नहीं थी और मेरे पिता उर्दू काअखबार पढ़ते थे. उस कस्बे में कोई भी सार्वजनिक पुस्तकालय नहीं था. हमारे सरकारीस्कूल में लाइब्रेरी के नाम पर पुस्तकों की एक अलमारी थी जिस पर हर वक्त ताला लगारहता था. हमारे हिन्दी के अध्यापक के हाथ में कभी-कभी“धर्मयुग”या“साप्ताहिक हिन्दुस्तान”पत्रिकाएँ नज़रआती थीं. मुझे याद है जब मैं सातवीं या आठवीं कक्षा में था तो एक बार जब अध्यापक“धर्मयुग”को मेज़ पर छोड़कर बाहर गये,तो मैंने उसे उठाकर जल्दी से उसमें छपी एक कविता पढ़ी जोमुझे बहुत अच्छी लगी.
उन दिनों कविताएँ पढ़ने के दो ही स्रोत मेरे पास थे. एक तोहिन्दी तथा पंजाबी की हमारी पाठ्यपुस्तकें (आठवीं कक्षा तक मैंने पंजाबी भी पढ़ी)जिनमें कविताओं के अलावा कहानियाँ,संस्मरण वयात्रा-वृतान्त होते थे. दूसरा,बच्चों के लिए“चंपक”, “पराग”व“नंदन” इत्यादि पत्रिकाएँ जोहमारे अखबारवाले के पास होती थीं. मैंने निराला,महादेवी वर्मा,भवानी प्रसाद मिश्र तथा दिनकर इत्यादि की कविताएँ पहली बार स्कूल की पाठ्यपुस्तकोंमें ही पढ़ीं. दूसरी तरफ, “चंपक”, “पराग”, “नंदन”इत्यादिपत्रिकाओं में बच्चों के लिए लिखी गयी बहुत साधारण किस्म की कविताएँ होती थीं.
यह सब बताने के पीछे मेरा उद्देश्य यह था कि बचपन में जब भीऔर जैसी भी कविताएँ पढ़ने का अवसर मुझे मिलता था,उन्हें पढ़ने के बाद मैं ख़ुद कविताएँ लिखना चाहता था औरउन्हें लिखने की कोशिश करता रहता था. पर उस उम्र में भी मैं देख पाता था कि मेरीलिखी कविताएँ लगभग वैसी ही होती थीं जैसी कविताएँ मुझे पढ़ने को मिलती थीं औरउन्हें मेरी अपनी कविताएँ कहना कठिन था.
पर यहाँ लगभग वैसा ही प्रश्न उठता है जैसा मुझे पूछा गया है: बचपन से ही मैं कविताएँ क्यों लिखना चाहता था?और इससे जुड़ा हुआ इससे भी अधिक मूल प्रश्न : मुझेपढ़ना-लिखना विरासत में नहीं मिला था,तब भी मैं बचपन में ही,और किसी भी चीज़से ज़्यादा,कविताएँ ही क्यों पढनाचाहता था?
मेरा ख़याल है कि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया जा सकता.यह इच्छा क्यों मुझमें थी,वह कहाँ से आयी,इस पर विचार करना फ़िज़ूल है. और जैसे कि मैंपहले भी इशारा कर चुका हूँ,हमारे परिवार,और गाँवों में रहने वाली हमारी बिरादरी में भी,साहित्य पढ़ने की कोई प्रथा नहीं थी. और अखबारभी केवल मेरे पिता ही पढ़ते थे,वो भी कस्बे मेंआ जाने के बाद. वे दसवीं तक पढ़े हुए थे.
चौदह से अठारह की उम्र के दौरान मैं कविता नहीं लिख पाया.परन्तु अठारह की उम्र में मैंने फिर से लिखना शुरू किया. उन दिनों मैं प्रसिद्धअमरीकी कविवाल्ट व्हिटमैन को बहुत पढ़ रहा था और उनकी कविताओं का प्रभावमेरी कविताओं पर साफ़ नज़र आता था. धीरे-धीरे मैं इस प्रभाव से निकल गया,परन्तु मुझे पता था कि मैं ज़्यादा अच्छीकविताएँ नहीं लिख पा रहा था.
ये वे दिन थे जब मैं एक वर्कशॉप में मेकैनिक,वेल्डर तथा खराद चलाने का काम कर रहा था,क्योंकि मैंने दसवीं के बाद पढ़ना छोड़ दिया था.दो साल तक यह काम करने के बाद मैंने फिर से पढना शुरू किया. तब तक एक सरकारी कॉलेजहमारे कस्बे में खुल गया था. जो वर्ष मैंने कॉलेज में बिताये उस दौरान मैंने कॉलेजकी लाइब्रेरी से ख़ूब पुस्तकें पढ़ीं,जिनमें कविता की पुस्तकों के अलावा उपन्यास,कहानियाँ,लेख तथा दर्शन कीपुस्तकें शामिल थीं. इन सालों में अंग्रेज़ी से येट्स व इलियट तथा हिन्दी सेनिराला,शमशेर,मुक्तिबोध,नागार्जुन व त्रिलोचन मेरे पसन्दीदा कवियों के तौर पर उभरे. बाद के सालों मेंकुछ और कवि भी इस सूची में जुड़े जिनमेंसेज़ार वय्याखो,बोर्ग्हेस तथा कुछ हद तकपाब्लो नेरुदा प्रमुख हैं.
इसके बाद मैं सेना में अफसर बनकर चला गया तथा छह साल जोमैंने वहाँ बिताये उस दौरान भी मैं कविताएँ लिखता रहा. लेकिन मुझे तब भी स्पष्टनहीं था कि मैं कविताएँ क्यों लिखता था या क्यों लिखना चाहता था. मैं अभी सेना मेंही था जब मैंने अपना पहला कविता संग्रह स्व-प्रकाशित किया. उसका शीर्षक था“अज्ञानता से अज्ञानता तक”.उस वक्त मैं26 वर्ष का था.27-28 की उम्र में,जब मैं कैप्टेनथा,मैंने सेना से त्यागपत्रदे दिया और एक बार फिर से पढाई शुरू की. मैं ऍमफिल व पीएचडी करने पंजाबविश्वविद्यालय,चंडीगढ़,आ गया और अगले पाँच वर्ष वहीं हॉस्टल में रहा.
यहाँ मैं कैंपस की राजनैतिक व बुद्धिजीवी-सांस्कृतिकगतिविधियों से जुड़ गया तथा कुछ और कवियों के साथ मिलकर कुछ साहित्यक गतिविधियाँ भीकरने लगा. इस तरह एक तरफ जहाँ मैंएस.एफ.आई. औरसी.पी.आई. (एम) कासदस्य बना (कुछ वर्ष बाद मैंने यह सदस्यता छोड़ दी),वहीं दूसरी तरफलाल्टू,सत्यपाल सहगल तथा मैंने मिलकर“हमकलम”नाम की एकसाइक्लोस्टाइल कविता-पत्रिका निकालनी शुरू की. यही वे दिन थे जब मैं भी उस तरह कीकविताएँ लिखने लगा जिन्हेंजनवादी-प्रगतिशील कविताएँ कहते हैं. और इस तरहशायद पहली बार मेरी कविताओं के लिखे जाने के पीछे कोई उद्देश्य था. और शायद इसीकारण हिमाचल के जनवादी तथा प्रगतिशील संघों ने मुझे भी कविता पाठ के लिए बुलाया.मुझे याद है कि मैं इसी सिलसिले में मंडी में था जब वहाँ त्रिलोचन जी से मेरी पहलीमुलाक़ात हुई. वे भी उस कविता पाठ में आमन्त्रित थे.
इसके बाद मेरी कविता में फिर एक मोड़ आया और जो दौर तब शुरूहुआ वह काफी लम्बे समय तक चला. इस दौर में जो कविताएँ लिखी गयीं वे मेरी भावनाओं वउन पर मेरे मनन का नतीजा थीं. अब सोचने पर मैं कह सकता हूँ कि मैं ये कविताएँक्यों लिख रहा था : उन दिनों मेरी भावनाएँ इतनी कष्टपूर्ण थीं और उन पर होने वालामेरा मनन इतना गहरा था कि मैं उन भावनाओं व उन पर होने वाले अपने मनन को प्रकटकरना चाहता था,उन्हें कहनाचाहता था,आवाज़ देना चाहता था. औरमेरे लिए ऐसा करने का सब से आसान तरीका कविता लिखना था --- साहित्य की यह एक ऐसीविधा थी जिसे रूप देना मैं काफी हद तक सीख चुका था. जब इस दौर की शुरुआत हुई तबमैं34-35 वर्ष का था.
मेरा ख़याल है कि मेरी सबसे इंटेंस कविताएँ इसी दौर में लिखीगयीं. लगभग15 वर्ष बरकराररहने के बाद यह इंटेंसिटी चली गयी,और मैंने देखा किधीरे-धीरे मेरी कविताओं के सरोकार,एक बार फिर,मुझसे बाहर की,शुरू में मेरे आसपास की लेकिन फिर उससे परे की भी दुनिया सेजुड़ने लगे. मुझे लगता है कि मैं अब भी इसी दौर में हूँ,लेकिन आजकल फिर मुझे यह पता नहीं है कि मैं कविताएँ क्योंलिख रहा हूँ या क्यों लिखना चाहता हूँ. अभी भी बस लिखना चाहता हूँ.
(02—2—2019)
रुस्तम की बारह कविताएँ
मन मर चुका है
मन मर चुका है.
पर देह अब भी ज़िंदा है.
मैं मृत्यु कोपुकारता हूँ.
वह जवाब नहीं देती.
ईश्वर कीमानिन्द
वह भी बहरी है.
या फिर
वह एक क्रूरतानाशाह है
जो अपनी इच्छा से उतरती है.
और मैं रोज़ उठताहूँ
तथा
जीवन और मृत्युको ---
दोनों को कोसताहूँ,
गाली देता हूँ.
एक अन्धी दीवारपर
पत्थर मारता हूँ.
लावा उबल रहा है
लावा उबल रहाहै,
उफ़न रहा है,
बढ़ रहा है मेरीओर.
समुद्र हाँफ रहाहै,
गरज रहा है,
खाँस रहा है,
चढ़ रहा है,
गोल-गोल घूम रहाहै,
झूम रहा है इधर-
उधर.
नदियाँ, झीलेंउतर गयी हैं
या बिफ़र गयी हैं.
पशु प्यासे हैंया डूब रहे हैं.
पक्षी गिर रहेहैं पेड़ों से.
पेड़ मर रहे हैं.
कितना अजब दृश्यहै !
जीवन सिमट रहाहै अन्तत: !
कल फिर एक दिन होगा
कल फिर एक दिन होगा.
कल फिर मैंचाहूँगा कि डूब जाये सूरज
अन्तिम बार.
पृथ्वी थम जाये
और धमनियों मेंबहता हुआ खून
जम जाये अचानक.
गिर पड़े यह जीवन
जैसे गिर पड़तीहै ऊँची एक बिल्डिंग
जब प्रलय कीशुरुआत होती है
और समाप्ति भी उसी क्षण.
कल फिर एक दिनहोगा.
कल फिर मैंचाहूँगा कि डूब जाये सूरज
अन्तिम बार.
यह वक्त नहीं जो चलता था
यह वक्त नहीं जो चलता था.
ये हम थे जो चलते थे,जो बूढ़े हो जातेथे,फिर मर जाते थे;
ये चीज़ें थीं जो चलती थीं,जो घिस-पिट जातीथीं,फिर ख़त्म हो जाती थीं.
वक्त नहीं,हम गुज़र जाते थे.
वक्त को किसने देखा था?
क्या पता वह था भी कि नहीं.
तुम देखना चाहते हो
तुम देखना चाहते हो
वास्तव में कुछ सुन्दर?
तो चट्टान को देखो.
भूचाल आते हैं.
पानी बरसता है उसके ऊपर.
सूर्य पड़ता है.
वह तिड़क जाती है,
ज़रा सरक जाती है,
या खड़ी रहती है माथा तानकर.
उसके सहस्र रंग
चमकते हैं
आसमान में.
जो मेरे लिए घृणित है
जो मेरे लिए घृणित है,
वही तुम्हें प्रिय है-
वही तुम्हें प्रिय है-
दुःख क्यों है?
इसलिए नहीं कि इच्छा है,
बल्कि इसलिए कि जीवन है.
इसलिए नहीं कि इच्छा है,
बल्कि इसलिए कि जीवन है.
मैं चाहता हूँ कि जीवन ख़त्म हो जाये.
सिर्फ मिट्टी और चट्टानें और पत्थर यहाँ हों.
तथा पर्वत. और बर्फ़.
और--
उफनता लावा.
तथा पर्वत. और बर्फ़.
और--
उफनता लावा.
मैं चाहता हूँ कि पृथ्वी अपने उद्गम की तरफ लौट जाये.
आग का
घुमन्तू गोला.
आग का
घुमन्तू गोला.
फिर बिखर जाये आसमान में.
फिर,
आसमान भी न रहे.
आसमान भी न रहे.
जीवन, जीवन
जीवन,जीवन,
यह तुमने ही किया है.
यह तुमने ही किया है.
लहू का यह प्याला
जो उम्र भर मैंने पिया है.
क्षत-विक्षत
यह जो मेरा हिया है.
यह किसने मुझे दिया है?
किसने?
जो उम्र भर मैंने पिया है.
क्षत-विक्षत
यह जो मेरा हिया है.
यह किसने मुझे दिया है?
किसने?
ओ शैतान !
तुम्हीं तो रहते हो
मेरे भीतर !
मेरी धमनियों में तुम्हीं बहते हो.
तुम्हीं तो रहते हो
मेरे भीतर !
मेरी धमनियों में तुम्हीं बहते हो.
और मैं
निर्बल यह जीव
नाचता हूँ
तुम्हारे ही
इशारों पर.
निर्बल यह जीव
नाचता हूँ
तुम्हारे ही
इशारों पर.
लो मैं फेंकता हूँ तुम्हें
उसी अन्धकार में
जहाँ से आये थे तुम
मुझे बनाने !
उसी अन्धकार में
जहाँ से आये थे तुम
मुझे बनाने !
जाओ !
और फिर लौटकर नहीं आओ !
शहर के जानवर
1.
सड़क पर बैठी हैं गायें
सहज आकार में,
इक-दूजे को छुए हुए.
सहज आकार में,
इक-दूजे को छुए हुए.
जुगाली कर रही हैं
और कितनी शान्त हैं !
और कितनी शान्त हैं !
दोनों ओर
गुज़र रही हैं गाड़ियाँ.
गुज़र रही हैं गाड़ियाँ.
2.
गर्मी के दिनों में
सबसे ज़्यादा मरती हैं
गली की गायें.
सबसे ज़्यादा मरती हैं
गली की गायें.
कचरा खा-खा कर
कैसे ऊबड़-खाबड़
हो गये हैं उनके पेट.
कैसे ऊबड़-खाबड़
हो गये हैं उनके पेट.
3.
खाना माँगते हैं
मार्किट के कुत्ते.
मार्किट के कुत्ते.
मैं फेंकता हूँ बिस्किट,
वे होड़ते हैं आपस में.
वे होड़ते हैं आपस में.
फिर आपस में ही
खेलने लगते हैं.
खेलने लगते हैं.
4.
बिल्लियाँ ढूंढती हैं
बच्चे जनने के स्थान.
बच्चे जनने के स्थान.
कभी-कभी
मैं भगा देता हूँ उन्हें.
मैं भगा देता हूँ उन्हें.
वे शिकायत भरी आँखों से
देखती हैं
देखती हैं
मेरी आँखों में.
5.
बिल्ली
बैठी होती है
छत की मुँडेर पर.
बैठी होती है
छत की मुँडेर पर.
वहाँ तक पहुँचता है
आम का पेड़.
आम का पेड़.
अक्सर वहाँ
पड़े मिलते हैं
किसी पक्षी के पंख.
पड़े मिलते हैं
किसी पक्षी के पंख.
छूती नहीं मुझे कोई हवा
छूती नहीं
मुझे कोई हवा.
मुझे कोई हवा.
मुझे देखते ही
पानी
खौलने लगता है.
पानी
खौलने लगता है.
मुझमें से फूटती हैं
असंख्य
चिंगारियाँ.
असंख्य
चिंगारियाँ.
एक आग है मेरे भीतर,
मेरे भीतर.
मेरे भीतर.
ओह मैं जल रहा हूँ,
मैं जल रहा हूँ !
मैं जल रहा हूँ !
ओह मैं जल रहा हूँ !
स्पेन के एक गाँव में
दो बूढ़े होते लोग
घर के छोटे-से लॉन में
कुर्सियों पर बैठे थे.
मुझे नहीं लगा कि वे आपस में कोईबातचीत कर रहे थे,
न ही वे कुछ पढ़ रहे थे.
वे बस
पश्चिम में
सूरज की ओर
मुँह किये बैठे थे,
धूप सेंक रहे थे,
गर्मियों की शाम की हल्की गर्म,मीठी,दुर्लभधूप.
उन्हें देखकर बस इतना समझ आता था
कि वे लम्बे समय से आपस में परिचित थे.
वहाँ बैठे हुए वे असहज नहीं लग रहे थे,बल्कियूँ कि जैसे वाकिफ़ थे उस जगह के कोनों-खूंजों से;एक-दूसरेकी अच्छी-बुरी आदतें भी ख़ूब जानते थे और उन्हें सहते थे.
घर के छोटे-से लॉन में
कुर्सियों पर बैठे थे.
मुझे नहीं लगा कि वे आपस में कोईबातचीत कर रहे थे,
न ही वे कुछ पढ़ रहे थे.
वे बस
पश्चिम में
सूरज की ओर
मुँह किये बैठे थे,
धूप सेंक रहे थे,
गर्मियों की शाम की हल्की गर्म,मीठी,दुर्लभधूप.
उन्हें देखकर बस इतना समझ आता था
कि वे लम्बे समय से आपस में परिचित थे.
वहाँ बैठे हुए वे असहज नहीं लग रहे थे,बल्कियूँ कि जैसे वाकिफ़ थे उस जगह के कोनों-खूंजों से;एक-दूसरेकी अच्छी-बुरी आदतें भी ख़ूब जानते थे और उन्हें सहते थे.
फिर भी वे मुझे दो क्षण-भंगुर मूर्तियों-से लगे
जो कभी भी ढह सकती थीं.
कभी भी गिर सकता था उनका करीने से सहेजा हुआ घर.
उनकी दुनिया
किसी भी क्षण
ग़ायब हो सकती थी.
जो कभी भी ढह सकती थीं.
कभी भी गिर सकता था उनका करीने से सहेजा हुआ घर.
उनकी दुनिया
किसी भी क्षण
ग़ायब हो सकती थी.
घर वैसे ही खड़ा है
घर वैसे ही खड़ा है जैसे कि वह कई साल पहले भी यहीं खड़ा होगा.
खिड़कियाँ खुली हुई हैं. धूप अन्दर आ रही है.
चीज़ें
अपनी-अपनी जगह पर उसी तरह से पड़ी हैं
जैसे कई साल पहले भी वे पड़ी होंगी.
खिड़कियाँ खुली हुई हैं. धूप अन्दर आ रही है.
चीज़ें
अपनी-अपनी जगह पर उसी तरह से पड़ी हैं
जैसे कई साल पहले भी वे पड़ी होंगी.
अलमारियाँ,पुस्तकें,शेल्फ. औरभी बहुत कुछ.
बैठक के एक कोने में दो कुर्सियाँ हैं.उनमें से एक पर एक बूढ़ा व्यक्ति बैठा है. दूसरी ख़ाली है.
लगता नहीं कोई आयेगा.
कुछ ही समय पहले
कुछ ही समय पहले दो लोग यहाँ रहते थे.
मैंने सुना है कि वे अजनबी थे इस संसार में.
"उन्होंने कुछ नहीं सीखा. कुछ भी नहीं कमाया.
जैसे आये थे,वैसेही चले गये.
इसीलिए यह घर इतना ख़ाली है.
उनका चिन्ह,कोईसंकेत इसमें नहीं.
न ही उनका साया."

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ईमेल :rustamsingh1@gmail.com
मैंने सुना है कि वे अजनबी थे इस संसार में.
"उन्होंने कुछ नहीं सीखा. कुछ भी नहीं कमाया.
जैसे आये थे,वैसेही चले गये.
इसीलिए यह घर इतना ख़ाली है.
उनका चिन्ह,कोईसंकेत इसमें नहीं.
न ही उनका साया."

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कवि और दार्शनिक,रुस्तम (30 अक्तूबर 1955) के पाँच कविता संग्रह प्रकाशित हुएहैं,जिनमें से एक संग्रह में किशोरों के लिए लिखी गयी कविताएँ हैं.उनकी कविताएँ अंग्रेज़ी,तेलुगु,मराठी,मल्याली,पंजाबी,स्वीडी,नौर्वीजी तथा एस्टोनी भाषाओं में अनूदित हुई हैं. रुस्तम उनकेपर्चे राष्ट्रीय व् अन्तरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं. उन्होंनेनार्वे के कवियों उलाव हाउगे व लार्श अमुन्द वोगे की चुनी हुई कविताओं का अनुवादहिन्दी में किया है. ये दोनों पुस्तकें वाणी प्रकाशन,नयी दिल्ली,से प्रकाशितहुई हैं.
वे भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान,शिमला,तथाविकासशील समाज अध्ययन केंद्र,दिल्ली,में फ़ेलो रहे हैं. वे "इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली",मुंबई,के सह-संपादकतथा श्री अशोक वाजपेयी के साथ महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,वर्धा,की अंग्रेजीपत्रिका "हिन्दी : लैंग्वेज,डिस्कोर्स,राइटिंग" के संस्थापक संपादक रहे हैं. वे जवाहरलाल नेहरूविश्वविद्यालय,नयी दिल्ली,में विजिटिंग फ़ेलो भी रहे हैं.
ईमेल :rustamsingh1@gmail.com




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