दसु — परमेश्वर उपदेश करता है कि (देहि मे॰) जोसामाजिक नियमों की व्यवस्था के अनुसार ठीक ठीक चलना है, यही गृहस्थ की परम उन्नति का कारण है।[२]
दसु — यं च भोजनाच्छादनयानकलाकौशलयन्त्रसामाजिकनियमप्रयोजनसिद्ध्यर्थं विधत्ते सोऽधिकतया स्वसुखायैव भवति।[३]
दसु — और जिसको भोजन</span>,<span>छादन</span>,<span>विमानादि यान</span>,<span>कलाकुशलता</span>,<span>यन्त्र औरसामाजिक नियम होने के लिये करते हैं</span>,<span>वह अधिकांश से कर्ता को ही सुख देने वाला होता है।[४]