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पाल वंश

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पाल साम्राज्य

750 ई०[1]–1161 ई०[2]
पाल साम्राज्य
नौवीं शताब्दी में पाल राजवंश का राज्यक्षेत्र[5][4]
Statusसाम्राज्य
राजधानी
सूची
प्रचलित भाषा(एँ)संस्कृत,[8]Proto-Bengali[9]
धर्म
तान्त्रिक बौद्ध धर्म,महायान,[10]Hinduism,[11]Shaivism[12]
सरकारराजतन्त्र
सम्राट 
गोपाल (प्रथम राजा)
 1139–1161
गोविन्दपाल (अन्तिम राजा)
ऐतिहासिक युगपूर्व-मध्यकालीन
 स्थापित
750 ई०[1]
 अंत
1161 ई०[2]
पूर्ववर्ती
परवर्ती
गौड़ साम्राज्य
चेरो वंश
सेन राजवंश
मिथिला के कर्नाट
बोध गया के पिथिपति
अब जिस देश का हिस्सा है
भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास
पाषाण युग (७०००–३००० ई.पू.)
  • निम्न पुरापाषाण (२० लाख वर्ष पूर्व)
  • मध्य पुरापाषाण (८० हजार वर्ष पूर्व)
  • मध्य पाषाण (१२ हजार वर्ष पूर्व)
  • (नवपाषाण)
  •  मेहरगढ़ संस्कृति (७०००–३३०० ई.पू.)
  • ताम्रपाषाण (६००० ई.पू.)
कांस्य युग (३०००–१३०० ई.पू.)
लौह युग (१२००–२६ ई.पू.)
मध्य साम्राज्य (२३० ई.पू.–१२०६ ईसवी)
देर मध्ययुगीन युग (१२०६–१५९६ ईसवी)
प्रारंभिक आधुनिक काल (१५२६–१८५८ ईसवी)
औपनिवेशिक काल (१५०५–१९६१ ईसवी)
श्रीलंका के राज्य
  • टैमबापन्नी के राज्य (५४३–५०५ ई.पू.)
  • उपाटिस्सा नुवारा का साम्राज्य (५०५–३७७ ई.पू.)
  • अनुराधापुरा के राज्य (३७७ ई.पू.–१०१७ ईसवी)
  • रोहुन के राज्य (२०० ईसवी)
  • पोलोनारोहवा राज्य (३००–१३१० ईसवी)
  • दम्बदेनिय के राज्य (१२२०–१२७२ ईसवी)
  • यपहुव के राज्य (१२७२–१२९३ ईसवी)
  • कुरुनेगाल के राज्य (१२९३–१३४१ ईसवी)
  • गामपोला के राज्य (१३४१–१३४७ ईसवी)
  • रायगामा के राज्य (१३४७–१४१२ ईसवी)
  • कोटि के राज्य (१४१२–१५९७ ईसवी)
  • सीतावाखा के राज्य (१५२१–१५९४ ईसवी)
  • कैंडी के राज्य (१४६९–१८१५ ईसवी)
  • पुर्तगाली सीलोन (१५०५–१६५८ ईसवी)
  • डच सीलोन (१६५६–१७९६ ईसवी)
  • ब्रिटिश सीलोन (१८१५–१९४८ ईसवी)
पाल राज्य के बुद्ध और बोधिसत्त्व
धर्मपाल का राज्य

पाल साम्राज्य मध्यकालीनउत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण साम्राज्य माना जाता है, जो कि 750-1174 इसवी तक चला। यह पूर्व-मध्यकालीन राजवंश था। इस वंश के शासकों नेभारत के पूर्वी भाग में एक विशाल साम्राज्य बनाया। जबहर्षवर्धन काल के बाद समस्त उत्तरी भारत में राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक गहरा संकट उत्पनन्न हो गया, तबबिहार,बंगाल औरउड़ीसा के सम्पूर्ण क्षेत्र में पूरी तरह अराजकत फैली थी। पाल साम्राज्य की नींव 750 ई. में राजागोपाल पाल ने डाली। बताया जाता है कि उस क्षेत्र में फैली अशान्ति को दबाने के लिए कुछ प्रमुख लोगों ने उसको राजा के रूप में चुना। इस प्रकार राजा का निर्वाचन एक अभूतपूर्व घटना थी। इसका अर्थ शायद यह है कि गोपाल उस क्षेत्र के सभी महत्त्वपूर्ण लोगों का समर्थन प्राप्त करने में सफल हो सका और इससे उसे अपनी स्थिति मज़बूत करन में काफ़ी सहायता मिली।

इस राज्य में वास्तु कला को बहुत बढावा मिला। पाल राजाओ के काल मेबौद्ध धर्म को बहुत बढावा मिला। पाल राजाहिन्दू थे परन्तु वे बौद्ध धर्म का भी सम्मान करते थे। पाल राजाओं के समय में बौद्ध धर्म को बहुत संरक्षण मिला। पाल राजाओं ने बौद्ध धर्म के उत्थान के लिए बहुत से कार्य किये जो कि इतिहास में अंकित है। पाल राजाओं ने हिन्दू धर्म को आगे बढ़ने के लिए शिव मंदिरों का निर्माण कराया और शिक्षा के लिए विश्वविद्यालयों का निर्माण करवाया।

इतिहास

पाल वंश का सबसे प्रसिद्ध सम्राट गोपाल का पुत्रधर्मपाल था। इसने 770 से लेकर 810 ई. तक राज्य किया। कन्नौज के प्रभुत्व के लिए संघर्ष इसी के शासनकाल में आरम्भ हुआ। इस समय के शासकों की यह मान्यता थी कि जो कन्नौज का शासक होगा, उसे सम्पूर्ण उत्तरी भारत के सम्राट के रूप में स्वीकार कर लिया जाएगा। कन्नौज पर नियंत्रण का अर्थ यह भी थी कि उस शासक का,ऊपरी गंगा घाटी और उसके विशाल प्राकृतिक साधनों पर भी नियंत्रण हो जाएगा। पहलेप्रतिहार शासकवत्सराज ने धर्मपाल को पराजित कर कन्नौज पर अधिकार प्राप्त कर लिया। पर इसी समयराष्ट्रकूट सम्राट 'ध्रुव', जोगुजरात औरमालवा पर प्रभुत्व के लिए प्रतिहारों से संघर्ष कर रहा था, उसने उत्तरी भारत पर धावा बोल दिया। काफ़ी तैयारियों के बाद उसनेनर्मदा पार कर आधुनिकझाँसी के निकट वत्सराज को युद्ध में पराजित किया। इसके बाद उसने आगे बढ़कर गंगा घाटी में धर्मपाल को हराया। इन विजयों के बाद यह राष्ट्रकूट सम्राट 790 में दक्षिण लौट आया। ऐसा लगता है कि कन्नौज पर अधिकार प्राप्त करने की इसकी कोई विशेष इच्छा नहीं थी और ये केवल गुजरात और मालवा को अपने अधीन करने के लिए प्रतिहारों की शक्ति को समाप्त कर देना चाहता था। वह अपने दोनों लक्ष्यों में सफल रहा। उधर प्रतिहारों के कमज़ोर पड़ने से धर्मपाल को भी लाभ पहुँचा। वह अपनी हार से शीघ्र उठ खड़ा हुआ और उसने अपने एक व्यक्ति को कन्नौज के सिंहासन पर बैठा दिया। यहाँ उसने एक विशाल दरबार का आयोजन किया। जिसमें आस-पड़ोस के क्षेत्रों के कई छोटै राजाओं ने भाग लिया। इनमेंगांधार (पश्चिमीपंजाब तथाकाबुल घाटी),मद्र (मध्य पंजाब), पूर्वीराजस्थान तथा मालवा के राजा शामिल थे। इस प्रकार धर्मपाल को सच्चे अर्थों में उत्तरपथस्वामिन कहा जा सकता है। प्रतिहार साम्राज्य को इससे बड़ा धक्का लगा और राष्ट्रकूटों द्वारा पराजित होने के बाद वत्सराज का नाम भी नहीं सुना जाता।

इन तीनों साम्राज्यों के बीच क़रीब 200 साल तक आपसी संघर्ष चला। एक बार फिरकन्नौज के प्रभुत्व के लिए धर्मपाल को प्रतिहार सम्राटनागभट्ट द्वितीय से युद्ध करना पड़ा।ग्वालियर के निकट एक अभिलेख मिला है, जो नागभट्ट की मृत्यु के 50 वर्षों बाद लिखा गया और जिसमें उसकी विजय की चर्चा की गई है। इसमें बताया गया है कि नागभट्ट द्वितीय ने मालवा तथामध्य भारत के कुछ हिस्सों पर विजय प्राप्त की तथा 'तुरुष्क तथा सैन्धव' को पराजित किया जो शायदसिंध में अरब शासक और उनकेतुर्की सिपाही थे। उसनेबंग सम्राट को, जो शायद धर्मपाल था, को भी पराजित किया और उसेमुंगेर तक खदेड़ दिया। लेकिन एक बार फिर राष्ट्रकूट बीच में आ गए। राष्ट्रकूट सम्राटगोविन्द तृतीय ने उत्तरी भारत में अपने पैर रखे और नागभट्ट द्वितीय को पीछे हटना पड़ा।बुंदेलखण्ड के निकट एक युद्ध में गोविन्द तृतीय ने उसे पराजित कर दिया। लेकिन एक बार पुनः राष्ट्रकूट सम्राट मालवा और गुजरात पर अधिकार प्राप्त करने के बाद वापस दक्षिण लौट आया। ये घटनाएँ लगभग 806 से 870 ई. के बीच हुई। जब पाल शासक कन्नौज तथा ऊपरी गंगा घाटी पर अपना प्रभुत्व क़ायम करने में असफल हुए, तो उन्होंने अन्य क्षेत्रों की तरफ अपना ध्यान दिया। धर्मपाल के पुत्रदेवपाल ने, जो 810 ई. में सिंहासन पर बैठा और 40 वर्षों तक राज्य किया,प्रागज्योतिषपुर (असम) तथा उड़ीसा के कुछ क्षेत्रों में अपना प्रभाव क़ायम कर लिया।नेपाल का कुछ हिस्सा भी शायद पाल सम्राटों के अधीन था। देवपाल की मृत्यु के बाद पाल साम्राज्य का विघटन हो गया। पर दसवीं शताब्दी के अंत में यह फिर से उठ खड़ा हुआ और तेरहवीं शताब्दी तक इसका प्रभाव क़ायम रहा।

अरब व्यापारी सुलेमान के अनुसार

अरब व्यापारी सुलेमान के अनुसार पाल वंश के आरम्भ के शासकों ने आठवीं शताब्दी के मध्य से लेकर दसवीं शताब्दी के मध्य, अर्थात क़रीब 200 वर्षों तक उत्तरी भारत के पूर्वी क्षेत्रों पर अपना प्रभुत्व क़ायम रखा। दसवीं शताब्दी के मध्य में भारत आने वाले एक अरब व्यापारी सुलेमान ने पाल साम्राज्य की शक्ति और समृद्धि की चर्चा की है।[उद्धरण चाहिए] उसने पाल राज्य को 'रूहमा' कहकर पुकारा है (यह शायद धर्मपाल के छोटे रूप 'धर्म' पर आधारित है) और कहा है कि पाल शासक और उसके पड़ोसी राज्यों, प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों में लड़ाई चलती रहती थी, लेकिन पाल शासन की सेना उसके दोनों शत्रुओं की सेनाओं से बड़ी थी। सुलेमान ने बताया है कि पाल शासक 50 हज़ार हाथियों के साथ युद्ध में जाता था और 10 से 15 हज़ार व्यक्ति केवल उसके सैनिकों के कपड़ों को धोने के लिए नियुक्त थे। इससे उसकी सेना का अनुमान लगाया जा सकता है।

तिब्बती ग्रंथों से

पाल वंश के बारे में हमेंतिब्बती ग्रंथों से भी पता चलता है, यद्यपि यह सतरहवीं शताब्दी में लिखे गए। इनके अनुसार पाल शासक बौद्ध धर्म तथा ज्ञान को संरक्षण और बढ़ावा देते थे।नालन्दा विश्वविद्यालय को, जो सारे पूर्वी क्षेत्र में विख्यात है, धर्मपाल ने पुनः जीवित किया और उसके खर्चे के लिए 200 गाँवों का दान दिया। उसनेविक्रमशिला विश्‍वविद्यालय की भी स्थापना की। जिसकी ख्याति केवल नालन्दा के बाद है। यहमगध में गंगा के निकट एक पहाड़ी चोटी पर स्थित था। पाल शासकों ने कई बारविहारों का भी निर्माण किया जिसमें बड़ी संख्या में बौद्ध रहते थे।

पाल शासक और तिब्बत

पाल शासकों के तिब्बत के साथ भी बड़े निकट के सांस्कृतिक सम्बन्ध थे। उन्होंने प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान सन्तरक्षित तथा दीपकर (जो अतिसा के नाम से भी जाने जाते हैं) को तिब्बत आने का निमंत्रण दिया और वहाँ उन्होंने बौद्ध धर्म के एक नए रूप को प्रचलित किया। नालन्दा तथा विक्रमशील विश्वविद्यालयों में बड़ी संख्या में तिब्बती विद्वान बौद्ध अध्ययन के लिए आते थे।

पाल शासकों केदक्षिण पूर्व एशिया के साथ आर्थिक तथा व्यापारिक सम्बन्ध थे। दक्षिण पूर्व एशिया के साथ उनका व्यापार उनके लिए बड़ा लाभदायक था और इससे पाल साम्राज्य की समृद्धि बढ़ी।मलाया,जावा,सुमात्रा तथा पड़ोसी द्वीपों पर राज्य करने वालेशैलेन्द्र वंश के बौद्ध शासकों ने पाल-दरबार में अपने राजदूतों को भेजा और नालन्दा में एक मठ की स्थापना की अनुमति माँगी। उन्होंने पाल शासक देवपाल से इस मठ के खर्च के लिए पाँच ग्रामों का अनुदान माँगा। देवपाल ने उसका यह अनुरोध स्वीकार कर लिया। इससे हमें इन दोनों के निकट सम्बन्धों के बारे में पता चलता है।

पालवंश के शासक

विभिन्न पुरालेखों और अभिलेखों की व्याख्या से इतिहासकारों ने पाल राजाओं के कालक्रम का इस तरह से अंदाज़ किया है:[14]

नामआवधि
गोपाल (पाल)750-770
धर्मपाल770-810
देवपाल810-850
शूर पाल महेन्द्रपाल850-854
विग्रह पाल854-855
नारायण पाल855-908
राज्यो पाल908-940
गोपाल 2940-960
विग्रह पाल 2960-988
महिपाल988-1038
नय पाल1038-1055
विग्रह पाल 31055-1070
महिपाल 21070-1075
शूर पाल 21075-1077
रामपाल1077-1130
कुमारपाल1130-1140
गोपाल 31140-1144
मदनपाल1144-1162
गोविन्द पाल1162-1174

पाल राजवंश के पश्चातसेन राजवंश ने बंगाल पर १६० वर्ष राज किया।

धर्मपाल

गोपाल के बाद उसका पुत्रधर्मपाल ७७० ई. में सिंहासन पर बैठा। धर्मपाल ने ४० वर्षों तक शासन किया। धर्मपाल ने कन्‍नौज के लिए त्रिदलीय संघर्ष में उलझा रहा। उसने कन्‍नौज की गद्दी सेइंद्रायूध को हराकरचक्रायुध को आसीन किया। चक्रायुध को गद्दी पर बैठाने के बाद उसने एक भव्य दरबार का आयोजन किया तथाउत्तरापथ स्वामिन की उपाधि धारण की। धर्मपाल बौद्ध धर्मावलम्बी था। उसने काफी मठ व बौद्ध विहार बनवाये। धर्मपाल एक उत्साही बौद्ध समर्थक था उसके लेखों में उसेपरम सौगात कहा गया है। उसने विक्रमशिला व सोमपुरी प्रसिद्ध बिहारों की स्थापना की। उसनेभागलपुर जिले में स्थित विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय का निर्माण करवाया था। उसके देखभाल के लिए सौ गाँव दान में दिये थे। उल्लेखनीय है कि प्रतिहार राजानागभट्ट द्वितीय एवंराष्ट्रकूट राजा ध्रुव ने धर्मपाल को पराजित किया था।

देवपाल

मुख्य लेख:देवपाल

धर्मपाल के बाद उसका पुत्रदेवपाल गद्दी पर बैठा। इसने अपने पिता के अनुसार विस्तारवादी नीति का अनुसरण किया। इसी के शासनकाल में अरब यात्री सुलेमान आया था। उसनेमुंगेर को अपनी राजधानी बनाई। उसने पूर्वोत्तर मेंप्राज्योतिषपुर, उत्तर मेंनेपाल, पूर्वी तट परउड़ीसा तक विस्तार किया।कन्‍नौज के संघर्ष में देवपाल ने भाग लिया था। उसके शासनकाल मेंदक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रहे। उसने जावा के शासकशैलेंद्र के आग्रह पर नालन्दा में एक विहार की देखरेख के लिए ५ गाँव अनुदान में दिए।

देवपाल ने ८५० ई. तक शासन किया था। देवपाल के बाद पाल वंश की अवनति प्रारम्भ हो गयी।मिहिरभोज औरमहेन्द्रपाल के शासनकाल में प्रतिहारों ने पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अधिकांश भागों पर अधिकार कर लिया।

महीपाल

  • ११वीं सदी मेंमहीपाल प्रथम ने ९८८ ई.-१०३८ ई. तक शासन किया। महीपाल को पाल वंश का द्वितीय संस्थापक कहा जाता है। उसने समस्तबंगाल औरमगध पर शासन किया।
  • महीपाल के बाद पाल वंशीय शासक निर्बल थे जिससे आन्तरिक द्वेष और सामन्तों ने विद्रोह उत्पन्‍न कर दिया था। बंगाल में केवर्त, उत्तरीबिहार मॆम सेन आदि शक्‍तिशाली हो गये थे।
  • सेन शसकों वल्लासेन औरविजयसेन ने भी अपनी सत्ता का विस्तार किया।
  • इस अराजकता के परिवेश में तुर्कों का आक्रमण प्रारम्भ हो गया।

चित्रावली

नालन्दा का महाविहार इतिहास के प्रथम महाविहारों में गिना जाता है। पालवंश के शासनकाल में यह महाविहार अपने यश के शिखर पर था।
नालन्दा का महाविहार इतिहास के प्रथम महाविहारों में गिना जाता है। पालवंश के शासनकाल में यह महाविहार अपने यश के शिखर पर था। 
सोमपुर महाविहार (पहाड़पुर बौद्ध बिहार)
सोमपुर महाविहार (पहाड़पुर बौद्ध बिहार) 
विक्रमशिला के ध्वंसावशेष
विक्रमशिला के ध्वंसावशेष 
पालवंश के सिक्के
पालवंश के सिक्के 

सन्दर्भ

  1. 12उद्धरण त्रुटि:<ref> का गलत प्रयोग;मजुमदर1977 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  2. 12Sengupta 2011, pp. 39–49. sfn error: no target: CITEREFSengupta2011 (help)
  3. Schwartzberg, Joseph E. (1978).A Historical atlas of South Asia. Chicago: University of Chicago Press. p. 146, map XIV.2 (g).ISBN 0226742210.मूल से से 24 फ़रवरी 2021 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 23 मई 2024.
  4. Daniélou, Alain (11 February 2003).A Brief History of India (अंग्रेज़ी भाषा में). Simon and Schuster. p. 144.ISBN 978-1-59477-794-3.Dharmapala's empire, which stretched from theGulf of Bengal toDelhi and fromJalandhara to theVindhya Mountains.
  5. Schwartzberg, Joseph E. (1978).A Historical atlas of South Asia. Chicago: University of Chicago Press. p. 146, map XIV.2 (g).ISBN 0226742210.मूल से से 24 फ़रवरी 2021 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 23 मई 2024.
  6. Michael C. Howard (2012).Transnationalism in Ancient and Medieval Societies: The Role of Cross-Border Trade and Travel. McFarland. p. 72.ISBN 978-0-7864-9033-2.
  7. Huntington 1984, p. 56. sfn error: no target: CITEREFHuntington1984 (help)
  8. Sengupta 2011, p. 102:Sanskrit continued to be the language under Sasanka, the Pala dynasty and the Sen dynasty. sfn error: no target: CITEREFSengupta2011 (help)
  9. Bajpai, Lopamudra Maitra (2020).India, Sri Lanka and the SAARC Region: History, Popular Culture and Heritage. Abingdon: Taylor & Francis. p. 141.ISBN 978-1-00-020581-7.
  10. Sen, Sailendra Nath (1999).Ancient Indian History and Civilization (अंग्रेज़ी भाषा में). New Age International. p. 285.ISBN 978-81-224-1198-0.
  11. Flåten, Lars Tore (4 October 2016).Hindu Nationalism, History and Identity in India: Narrating a Hindu past under the BJP (अंग्रेज़ी भाषा में). Routledge.ISBN 978-1-317-20871-6.
  12. Alexis Sanderson (2009)."The Śaiva Age: The Rise and Dominance of Śaivism during the Early Medieval Period". In Shingo Einoo (ed.).Genesis and Development of Tantrism. Institute of Oriental Culture, University of Tokyo. pp. 108–115.ISBN 9784903235080.
  13. उद्धरण त्रुटि:<ref> का गलत प्रयोग;Majumdar1977 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  14. Susan L. Huntington (1984). The "Påala-Sena" Schools of Sculpture. Brill Archive. pp. 32–39. ISBN 90-04-06856-2

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